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श्रेष्ठ समाज का पुनर्निर्माण 

  • श्रेष्ठ समाज सेवासमाज सेवक और सुखी समाज 

            प्रस्तुत चित्रावली और व्याख्या-माला में समाज सेवा और समाज सेवक के विषय में कुछेक महत्वपूर्ण बातों को दर्शाया गया है।  इसमें आज के मानव की मनोस्थिति, घर-परिवार और समाज की दशा तथा देश-विदेश की हालत का भी चित्रण किया गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आज के सन्दर्भ में क्या समाज सेवा होनी चाहिए।  साथ-साथ यह भी बताया गया है कि समाज के गठन हेतु समाज की रुपरेखा क्या हो।  स्वच्छ, स्वस्थ और सुखद समाज का नक्शा सामने न होने करण समाज-सेवक उस दिशा की ओर आगे बढ़ने का यत्न नहीं करते बल्कि वे आज की कुछ समस्याओं को लेकर उन्हें सुलझाने में लगे हुए हैं।  पत्ते-पत्ते को पानी देने से वृक्ष कब तक हरा-भरा रहेगा? रोग के चिन्हों को हटाने का पुरुषार्थ करने से रोग कैसे समाप्त हो जाएगा? रोग का निवारण तो उसके मूल कारण को निर्मूल करने से होगा।  परन्तु खेद है कि आज रोग के मूल कारण की ऒर कम ध्यान है और उस का मूलोच्छेदन करने की सेवा कम है।
: ब्रह्माकुमार जगदीशचंद्र

 

  • नव समाज का दिग्दर्शन

            वर्तमान समय चारों ओर व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन तथा सामाजिक जीवन में कष्ट बढ़ रहें हैं।  आशंका तथा भय के बादल मंडरा रहें हैं।  नित्य नई -नई समस्याएं पैदा हो रही हैं।  आपसी मन-मुटाव और संघर्ष बढ़ते जा रहें हैं।  मानसिक तनाव के प्रकोप से बाल, युवा और वृद्ध कोई भी अछूत नहीं रहा है।

            भौतिकता का बोलबाला है।  संबंधों में स्वार्थ की प्रधानता होती जा रही है।  नैतिक, मानवीय एवं सामाजिक मूल्य प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं।  पाश्विक तथा आसुरी प्रवृत्तियां उत्कर्ष पर हैं।  आतंकवाद, विघटनात्मक दृष्टिकोण  एवं हिंसात्मक वृतियां पनप रही हैं।  सरकारी तंत्र अपनी समूची शक्ति का प्रयोग इन्ही वृत्तिओं से झूझने में कर रही है।  अर्थ व्यवस्था डावांडोल हो रही है।  व्यक्ति का जीवन खोखला हो रहा है।  आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती।

            ऐसे दूषित वातावरण में, हर गांव, नगर, देश-प्रदेश, धर्म और जाति के प्रत्येक नर-नारी, बच्चे और वृद्ध व्यक्ति के मन में परिवर्तन की अभिलाषा है।  हरेक चाहता है कि एक ऐसा दिव्य परिवर्तन आए, एक श्रेष्ट समाज बने जहाँ मानसिक शांति, सम्पूर्ण सुख समृद्धि और धर्मपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ व्यवहार हो, सर्वगुणों एवं शक्तियों से संपन्न अलौकिक जीवन हो तथा पर्यावरण एवं प्रकृति हर प्रकार से सुखद एवं मंगलमय हो।

            आज देहधारी मानव को ऐसे श्रेष्ठाचारी सतयुगी समाज को पुनः साक्षात् देखने की इच्छा है जैसे कि वह 5000 वर्ष पूर्व अर्थात विश्व के आदिकाल में था जब सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन  के साथ-साथ पशुओं और पक्षिओं का जीवन भी हर प्रकार के कष्टों से मुक्त तथा सुख और मौज से भरपूर था।  उसी दुनिया के बारे में आज भी गायन है कि उसमें शेर और गाय एक घाट पर पानी पीते थे।

विश्व में शुभपरिवर्तन की क्रांति विज्ञान से नहीं,

उत्तम विचारधारा से आएगी।  

 

  • आदर्श समाज 

            समाज, उस व्यवस्था नाम है जिसमें लोग प्रशासन, अनुशासन और संयम से रहते हुए निर्भय, स्वस्थ, सुखी और परस्पर सहयोगी होते हैं।  एक अच्छे समाज में पारिवारिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की दृष्टि से भी मानव जीवन संपन्न होता है, उसमें बौद्धिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक हर प्रकार से अर्थात सर्वांगीण रूप से विकाश अपने शिखर पर होता है।

            एक आदर्श समाज में, पारिवारिक जीवन में सम्पूर्ण सुख-सुविधा तथा व्यक्तिगत जीवन में निश्चिंतता होती है अर्थात किसी भी प्राप्ति के छीन जाने का भय नहीं होता है। ऐसे समाज में, वैज्ञानिक तथा तकनिकी विकाश के  साथ-साथ सर्व कलाओं का उत्कर्ष भी चारों ओर दिखाई देता है।  प्रत्येक नर श्रीनारायण स्वरुप और प्रत्येक नारी श्रीलक्ष्मी स्वरुप होती है तथा हर बाल, युवा एवं वृद्ध के जीवन में समरस्ता एवं आनंद ही आनंद होता  है।

            एक आदर्श समाज में, मानव जीवन तो क्या पाश्विक योनियों में भी वैर, द्वेष का नामोनिशान नहीं होता। प्रकृति के तत्व भी सतोप्रधान अवस्था में होने के कारण मानव मात्र के सदा सहयोगी रहते हैं।  न बाढ़  का भय होता है, न भूकंप का डर।  मौसम  सदाबहार, चारों ओर हरियाली-ही-हरियाली होती है।

            रोग और शोक से मुक्त सभी नर-नारी दीर्घायु जीवन व्यतीत करते अपने नश्वर शरीर को ऐसे छोड़ते हैं मानो पुराने वस्त्र के स्थान पर नया वस्त्र धारण कर रहे हों। जन्म लेते, जीवन व्यतीत करते तथा शरीर छोड़ते समय किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होता।  इसे ही भारत का स्वर्णिम काल अथवा सतयुग, सर्वगुण संपन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम, अहिंसा-पूर्ण श्रेष्ठाचारी समाज कहा जाता है।

दूसरों को ख़ुशी देना सबसे बड़ा उपहार है। 

मुख से मीठे बोल बोलने वाला ही सबका प्रिय बन जाता है।  

 

 

  • आज का समाज  

            आज समाज के हर व्यक्ति के मन को, चाहे वह छोटा है या बड़ा, राष्ट्रिय या अंतराष्ट्रीय, असाधारण या साधारण, पांच विकारों रूपी माया ने अपने अधिकार में कर लिया है।  व्यक्ति का मन, मस्तिष्क और बुद्धि इसके वश में है।  इसके कारण मानव अनेकानेक दुष्कर्म कर रहा है।  इसलिए आज समाज में चारों ओर पाप और अत्याचार फैल रहे हैं।  असुरक्षा की भावना सारे विश्व में बढ़ रही है।  घृणा और क्रोध के वशीभूत एक देश दूसरे देश पर अकर्मण कर  देता है।  मिसाइल एवं परमाणु बम ने वातावरण को भयावह बना दिया है।  लोभ के अधीन होकर आज का परिवार नववधु को जीवघात करने पर मजबूर कर देता है।  आपसी मतभेद के कारण परिवार टूट रहे हैं और पारिवारिक समस्याएं दिनोंदिन बढ़ रही है।  संबंधों में स्वार्थ का बोलबाला है।  भाई-भतीजावाद की प्रवृति बढ़ रही है।  हरेक का दृष्टिकोण संकुचित होता जा रहा  है।

            पर्यावरण के प्रदुषण तथा असंतुलन के परिणाम स्वरुप कहीं सूखा है तो कहीं पर बाढ़ का प्रकोप है।  राष्ट्रिय हित की अवहेलना करके व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण बड़े-बड़े कारखानों में तालबंदी हो रही है जिससे बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ती जा रही है।  अमूल्य समय हड़तालों, धरनों और आंदोलनों के कारण नष्ट हो जाता है।

            प्रभुचिंतन तथा स्वाध्याय को छोड़ आज का मानव अश्लील साहित्य, नशीले पदार्थों के सेवन और कुव्यसनों में लगा है।  वह तनाव और अशांति से छुटकारा पाने के लिए भटक रहा है तथा सच्चे सुख और शांति को ढूंढ रहा है।  धर्म-भेद, भाषा-भेद आदि बढ़ रहे हैं।  चारों ओर आतंकवाद एवं हिंसात्मक वृतियां बढ़ रही है।

टूटे किनारे वाली नदी बाढ़ लाती है।  

अपनी मर्यादाओं में न रहने वाला मनुष्य विध्वंसकारी होता है। 

 

 

  •  सोशल (SOCIAL) शब्द का अर्थ 

SOCIAL  शब्द में छः अक्षर हैं।  उनमें से हरेक से निम्नलिखित प्रेरणा ले सकते हैं :

S : For Sympathy            : करुणा, दया            O : For Oneness :  एक में विश्वास 

C : For Co-Operation    : सहयोग                    I : For Introversion : अंतर्मुखता 

A : For Alertness             : सावधानी                L : For Love : स्नेह, प्यार 

 

            इस धरा पर अनेक ऐसे समाज सेवक हुए हैं जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज की भलाई के लिए समर्पित कर दिया।  उन्होंने सामाजिक हित को व्यक्तिगत और पारिवारिक हितों से ऊपर रखा।  चाहे स्वतंत्रता संग्राम हो या रूढ़ीवाद से तथा सामाजिक कुरीतिओं से टकराव, उन्होंने इन सब का दृढ़ता से मुकाबला किया।  चाहे इस संघर्ष में अपने प्राण ही न्योछावर करने पड़े, परन्तु उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं हटाए।  ऐसे सर्वहितकारी समाज सेवक इस धरा पर पैदा हुए हैं, यथाः अहिंसा एवं सहिष्णुता की मूर्ति महात्मा बुद्ध।  उनके ह्रदय में सर्व के प्रति करुणा एवं दया का भाव सदा बना रहा।

            नानकदेव का एक ईश्वर में दृढ विश्वास था,  ईश्वर एक है और वह निराकार है , यह सन्देश जन-जन तक पहुंचाकर अन्धविश्वास और जातिवाद में भटक रहे मानव को एक नई दिशा देने का पुरुषार्थ किया।  महावीर का जीवन अंतर्मुखी था, नियम-संयम तथा एकाग्रता एवं अंतर्मुखता के बल पर बुराई पर अच्छाई की जीत संभव है, यह विश्वास उन्होंने पुनः जागृत किया।  ईसा मसीह प्रेम के संदेशवाहक थे, अपने पड़ोसी से प्यार करो – यह मुहब्बत का पैगाम लेकर वे उस समय इस धरा पर आए जब चारों ओर द्वेष अग्नि फैल रही थी।  सभी के दिलों में पुनः ईश्वर का विश्वास पैदा करके, उन्हें आपसी भाईचारे का सन्देश दिया।  महात्मा गाँधी ने अहिंसापूर्ण संघर्ष की शक्ति का अद्भुत प्रयोग किया।  भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में  स्थान सर्वश्रेष्ठ है।  एकता का नारा बुलंद करके उन्होंने जन शक्ति को पुनः संगठित किया और एक ऐसी शक्ति को नतमस्तक कराया जिसके लिए गायन था कि  साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता।

            छत्रपति शिवाजी  जीवन भर जागरूक रहे।  तत्कालीन समाज को गुलामी की जंजीरों से स्वतंत्र कराने के लिए छत्रपति शिवाजी ने जिस प्रकार शत्रु से लोहा लिया, वैसा अन्य उदहारण भारत के इतिहास में नहीं मिलता।  जीजा बाई द्वारा बचपन में सुनाई गई वीर गाथाओं को उसके सपूत छत्रपति शिवा जी ने अत्याचार एवं जुल्म के विरुद्ध लड़ कर साकार कर दिखाया।

 

 

  • सच्चा  समाज सेवक 

            समाज सेवक के व्यक्तित्व की  समाज के परिवर्तन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है।  एक अच्छा समाज सेवक सूझबूझ एवं दूरदर्शिता द्वारा समाज को उत्थान की ओर अग्रसर करता है। उसका अपना दिव्यगुण संपन्न जीवन समाज की नब्ज को समझने में तथा उसका मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होता है।  एक अच्छे समाज सेवक से वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा की जाती है ताकि वह प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति को ठीक प्रकार से समझ कर उसका समाधान समाज को दे सके। समाज के सम्पूर्ण उत्थान के लिए समाज सेवक की रचनात्मक बुद्धि बहुत ही सहायक सिद्ध होती है।

            समाज सेवक का निष्पक्ष भाव उसे सर्वप्रिय  बनाता है।  वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति से धर्म, जाति, भाषा, रंग आदि के भेद से ऊपर उठकर एक समान व्यवहार करके उसे अपने समीप लाता है तथा सर्व के सहयोग से समाज को नई दिशा प्रदान करता है।यदि समाज सेवक का अपना जीवन लोभ, अहंकार आदि आसुरी वृत्तिओं के अधीन हो जाए तो समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास होने लगता है और सामाजिक व्यवस्था अंधकार रूपी गर्त की ओर बढ़ने लगती है।  ऐसी परिस्थिति में समाज सेवक नाम, मान, शान के लिए अथवा बाहरी दिखावे के अधीन होकर समाज सेवा का प्रदर्शन मात्र करता है।  इनसे न तो समाज का कुछ भला होता है और न ही समाज सेवक को आंतरिक ख़ुशी मिलती है।  अतः यह बहुत ही आवश्यक है कि समाज सेवा की ओर अपना कदम बढ़ाने से पहले समाज सेवक अपने लक्ष्य एवं उदेश्य को अच्छी तरह से निर्धारि कर ले।

परिस्थितियों में अपने पथ से विचलित न होना ही 

वीर पुरुष का लक्षण है। 

 

 

  • सहयोग से सुखमय समाज 

            समाज में मुख्य तीन सत्ताएं हैं – वैज्ञानिक सत्ता, राजनितिक सत्ता तथा धार्मिक सत्ता।  विज्ञानं नए-नए अविष्कार करके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन के लिए साधनों  निर्माण करके, उसे भौतिक समृद्धि प्रदान करने का प्रयास करता है परन्तु इसके द्वारा आण्विक शस्त्रों के निर्माण से मानव जाति में भय और चिंता व्याप्त है।  आण्विक शस्त्रों का प्रयोग सम्पूर्ण मानव जाति को नष्ट कर सकता है।

            एक अच्छी राजनितिक सत्ता समाज में सुचारु प्रशासन व्यवस्था को स्थापित करती है।  राज्य प्रणाली में समय-समय पर आवश्यक परिवर्तन होते रहते हैं।  वर्तमान प्रजातंत्र व्यवस्था में नैतिक मूल्यों के ह्रास ने स्वार्थपूर्ति के लिए असामाजिक तत्वों को जन्म दिया है।  अव्यवथा, असुरक्षा, तथा अशांति बढ़ रही है।  अपने राज्य को बढ़ाने के  लिए सीमाओं का उल्लंघन होता रहता है।  एक देश दूसरे देश को अपने अधीन करके गौरवान्वित महसूस करता है।  भ्रष्टाचार और कुशासन का बोलबाला है।

            धार्मिक सत्ता को व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन में मूल्यों को बनाए रखने में मार्ग-दर्शक का कार्य करना चाहिए।  उसे राजनितिक सत्ता तथा वैज्ञानिक सत्ता को अपनी सीमाओं में कार्य करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देना चाहिए।  धर्म की सत्ता को सर्वोच्च मन जाता है।  धर्म को ‘घोड़ा’ और कर्म को ‘गाड़ी’ की संज्ञा दी गई है परन्तु वर्तमान समय धर्म रूपी घोड़ा गाडी के पीछे चलने को मजबूर है।  इसलिए अन्य दोनों सत्ताएं निरंकुश होकर सामाजिक व्यवस्था को पथ-भ्रष्ट कर रही हैं।

             स्वर्णिम समाज के पुनर्निर्माण के लिए तीनों सत्ताओं को एक-दूसरे के समीप आना होगा।  आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए वैज्ञानिक सत्ता प्राणिमात्र की भलाई के लिए नए अविष्कार करे, राज्य सत्ता सादगी, संयम एवं अनुशासन की पहले स्वयं उदाहरण बने और धार्मिक सत्ता आध्यात्मिक सशक्तिकरण द्वारा आसुरी शक्तियों पर अंकुश लगाए। तीनों सत्ताओं के आपसी सहयोग से सुखमय समाज का निर्माण संभव है।

दूसरे से आदर प्राप्त करने की पहली आवश्यकता यह है 

आप दूसरों को आदर दें। 

 

 

  • आध्यात्मिकता द्वारा पुनर्निर्माण 

            प्रत्येक संगठन के उज्जवल भविष्य का आधार उसका सुयोग्य नेता है।  एक अच्छे नेता की विशेषता उसका दिव्य चरित्र एवं  व्यवहार कुशलता है।  यदि वह स्वयं अनुशासित है अर्थात उसकी सूक्ष्म शक्तियां – मन, बुद्धि और संस्कार उसके नियंत्रण में है तो वह अवश्य ही वह अपने संगठन को भी मर्यादित एवं निष्ठावान बना सकता है।

             ‘मन’ अर्थात संकल्प शक्ति ‘बुद्धि’ अर्थात निर्णय शक्ति और ‘संस्कार’ अर्थात स्मृति शक्ति – ये तीनों शक्तियां आत्मा की सूक्ष्म शक्तियां हैं।  जैसे एक रथवान अपने रथ के घोड़ो को अपने बाहुबल द्वारा नियंत्रित करता है, वैसे ही आत्मा अपनी इन तीनों शक्तियों को आध्यात्मिक अल के द्वारा नियंत्रित करती है।

              यदि आत्मा में आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है तो वह अपने मन, बुद्धि, संस्कार तथा अपनी सर्व ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का ठीक मार्गदर्शन नहीं कर सकती। ऐसी स्थिति में उसके कर्म अमर्यादित एवं निकृष्ट ही होंगे जिससे समाज में पाप और अत्याचार बढ़ता है, तथा सम्बंधों में स्वार्थ, साहित्य में अश्लीलता और धर्म के नाम पर अधर्म पनपने लगता है।  आसुरी वृत्तियों के अधीन मानवीय जीवन नरकमय बन जाता है।

            इसलिए सनाज को पुनः श्रेष्ठाचारी बनाने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान किआ परम आवश्यकता है।  स्वयं की सत्य पहचान, अर्थात “मैं ज्योति-स्वरुप अविनाशी चेतन आत्मा हूँ, शांति मेरा स्वधर्म है। पांच तत्वों  पार ब्रह्मलोक मेरा निज धाम है।  ज्योति-स्वरुप परमात्मा शिव मेरे रूहानी पिता हैं।  मैं उनकी अमर संतान हूँ। इस सृष्टि पर श्रेष्ठ कर्म करने के लिए आया हूँ।” यही आध्यात्मिक ज्ञान का मूल-मन्त्र है। आत्मा जब पुनः अपने स्वधर्म में स्थित होकर अपनी कर्मेन्द्रियों द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने लगती है तो श्रेष्ठ समाज का पुनर्निर्माण होता है।

मन का अंधकार दूर करो,

जग स्वतः ही प्रकाशित हो जायेगा। 

 

 

  • सर्वोच्च समाज सेवक 

 

              प्रत्येक संगठन में कोई-न-कोई विशेष व्यक्ति होता है जिस पर उस संगठन को सुचारु रूप से चलने की ज़िम्मेवारी रहती है। एक परिवार में यह ज़िम्मेवारी घर के पिता की होती है कि वह अपने परिवार को हर प्रकार से सकुशल रखे तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य की उन्नति की ओर पूरा ध्यान दे।  इसी प्रकार अपने राष्ट्र को गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के श्रेष्ठ कार्य में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाला तथा अपने राष्ट्र को नई दिशा दिखने वाला ‘राष्ट्रपिता’ कहलाता है।  भारत देश में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ऐसा एक सशक्त उदाहरण थे जिन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्य से भारत देश को स्वतंत्र करने के लिए जनशक्ति का सहयोग लेकर कड़ा संघर्ष किया और कठोर यातनाएं सहन की।  अपने प्राणों की बलि देने में भी संकोच नहीं किया।  पूरा राष्ट्र ऐसे महान सेनानियों को याद करता है। 

            राष्ट्र हित को सम्मान देने के लिए तथा विभिन्न राष्ट्रों के आपसी सम्बंधों में समरसता बनाए रखने के लिए ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ कार्यरत है।  निश्चित कार्यक्रम या आपदा काल में इसके सदस्य आपस में मिलते रहते हैं।  इस संस्था के कार्य को सुचारु रूप से चलने के लिए ‘महासचिव’ का चयन किया  और इसकी महासभा के लिए तत्कालीन अध्यक्ष होता है।  वे अपनी बुद्धिमता एवं योग्यता तथा सर्व के सहयोग से अपने संगठन की मान-मर्यादा एवं भव्यता को बनाए रखने का भरसक प्रयास करते हैं।

         इसी प्रकार सृष्टि रंगमंच पर पार्ट  वाली सर्व आत्माओं के मार्गदर्शक परमपिता निराकार ज्योतिस्वरूप परमात्मा शिव हैं जो कल्पांत के समय, जब सृष्टि पर अधर्म बढ़ जाता है, तब वह साकार प्रजापिता ब्रह्मा के माध्यम द्वारा सहज ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग की शिक्षा देकर पुनः पतित से पावन बनाकर श्रेष्ठाचारी सतयुग में जाने का मार्ग दिखते हैं एवं आत्माओं को पुनः आध्यात्मिक शक्ति प्रदान कर सशक्त करते हैं।  अतः परमपिता परमात्मा ही सर्वोच्च समाज सेवक है जिनके द्वारा श्रेष्ठ समाज का पुनर्निर्माण होता है।

याद रखें सहन वही कर सकता है जो शक्तिशाली होता है। 

 

 

  • राजयोग द्वारा नवनिर्माण 

            समाज को व्यवस्थित रूप चलाने के लिए समय प्रति समय पूंजीवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि विभिन्न व्यवस्थाओं ने जन्म लिया।  कुछ समय तक अपना प्रभाव दिखाने के बाद सभी व्यवस्थाएं एक-के-पश्चात् एक मानव मन पर निष्प्रभाव हो गई अथवा अपनी सतोगुणी स्थिति से तमोगुणी की ओर अग्रसर हो गई।

            दिनोंदिन मानवीय जीवन में दिव्य गुणों का ह्रास हुआ और आसुरी वृत्तियों ने सामाजिक ढांचे को चकनाचूर कर दिया।  अब समय की पुकार है कि एक ऐसी व्यवस्था का पुनर्निर्माण हो जिससे समाज पुनः श्रेष्ठाचारी बन जाए।  एक ऐसे साम्राज्य की पुनर्स्थापना हो जहाँ सभी भेदभाव मिट जाए और एक भाषा, एक धर्म, एक सम्पूर्ण अहिंसक एवं सर्व मर्यादाओं से संपन्न राज्य हो। ऐसी व्यवस्था के लिए समाज की मूल इकाई व्यक्ति के विचारों में परिवर्तन  होगा।  यह परिवर्तन राजयोग के अभ्यास से संभव है।

            राजयोग का अभ्यास अपने संकल्पों को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता है।  ‘मैं एक पवित्र, शुद्धस्वरूप, चेतन आत्मा हूँ’ – इस शुद्ध  संकल्प रूपी बीज को यदि मर्यादाओं एवं धारणाओं, अर्थात शुद्ध सात्विक अन्न, सत्संग, ब्रह्मचर्य की पालना और दिव्य गुणों की धारणा के जल से सींचा जाए तो मन पुनः एकाग्र अर्थात एक ईश्वर में केंद्रित होने लगता है।  इस इस विधि से आत्मा का दिव्य सशक्तिकरण होता है।  उसमें आसुरी वृत्तियों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता पैदा होती है।  पाप मुक्त हो, आत्मा पुनः श्रेष्ठ कर्म की ओर अग्रसर होती है।

संसार में समस्याएं तो बढ़ती जाएंगी, मुझे समस्याओं से 

निपटने की अपनी शक्ति को बढ़ाना है।  

 

 

मूल्य-निष्ठ समाज 

            समाज की मूल इकाई एक व्यक्ति है। जिस प्रकार एक छोटे से पत्थर के पानी में गिरने से तरंगे उस स्थान से चारों ओर फैलने लगती हैं और वे धीरे-धीरे सारे तालाब को प्रभावित करती देती हैं, ठीक उसी प्रकार एक व्यक्ति के मस्तिष्क से निकले शुद्ध विचरों के प्रकम्पन समाज के अन्य व्यक्तियों के मस्तिष्क को भी प्रभावित कर सकते हैं। यदि एक व्यक्ति के जीवन में मूल्यों का विकाश होने लगे तो अवश्य ही उसे देखकर धीरे-धीरे  अन्य व्यक्ति भी उसका अनुकरण करने लगेंगे तथा समाज के दिव्यीकरण की एक नई विचारधारा सुदृढ़ होने लगेगी।

            मानव जीवन में आत्मिक बल अर्थात मनोबल का बहुत ही महत्त्व है।  इस अद्भुत बल से ही विभिन्न शक्तियों का विकास होता है। सतोप्रधान निर्णय शक्ति के आधार पर ही व्यक्ति श्रेष्ठता के शिखर पर पहुँचता है।  सहन करने की शक्ति जीवन को उज्जवल बनती है तथा सामना करने की शक्ति व्यक्ति को निर्भय बनती है।  परख शक्ति उसे हीरे और कंकड़ के भेद का बोध कराती है तो समेटने की शक्ति उसे कई उलझनों से बचा लेती है।

            शक्ति जब कर्म में आती है तो गुण  स्वरुप बन जाती है।  विभिन्न दिव्य गुण – पवित्रता, प्रेम,शांति, आनंद आदि गन ही मानव जीवन के श्रृंगार हैं।  गुणविहीन व्यक्ति का जीवन पशु के सामान है।  गुणवान  जीवन एक ऐसे पेड़ के सामान है जो पके हुए फलों से भरपूर हो। इसके साथ ही साथ यदि उसमें विनम्रता का गुण विशेष है तो वह समाज सेवक अहम् भाव से मुक्त अनेकों के अंधकारपूर्ण जीवन में रौशनी ला सकता है। अतः समाज सेवक के जीवन में गुणों एवं शक्तियों का विकाश अवश्य ही अनेकों के जीवन को दिव्य बनाने सहायक सिद्ध होगा।

हर श्रेष्ठ कार्य को साहस से करने वाला ही सम्मान पता है। 

सर्व  के लिए शुभ भावना, शुभ कामना रखें, दुआओं का खज़ाना जमा करें। 

 

 

वसुधैव कुटुंबकम 

            हम देखते हैं एक नाटक में विभिन्न पार्टधारी, विभिन्न वेशभूषा को धारण करके अनेक प्रकार के पार्ट बजाते हैं।  कोई राजा बनता तो कोई मंत्री का पार्ट बजाता है। एक साधु का वेश धारण करके भगवान की वंदना करता है तो दूसरा डाकू बनकर अनेक धनवानों को लूट लेता है। कोई बहिन-माता का रूप बनाकर अपने बच्चे का लालन-पालन करती दिखाई देती तो कोई नाच दिखाकर अनेकों का मनोरंजन करती है।

            नाटक के अंत में उस नाटक का मुख्य पार्टधारी अथवा निदेशक मंच पर आता है और सभी पार्टधारियों का परिचय सभी को करवाते हुए सभी को अपने साथ ले जाता है। सभी पार्टधारी अपने पार्ट की ड्रेस उतार कर अपना असली ड्रेस पहन कर अपने घर को लौट जाते हैं अब न कोई राजा है, न कोई मंत्री। साधु और डाकू का पार्ट बजने वाला भी अब न साधु रहा न डाकू।

            इसी प्रकार से यह सृष्टि एक रंगमंच है।  इस रंगमंच पर आत्माएं पांच तत्वों के शरीर धारण कर सतयुग के आरम्भ से लेकर कलयुग के अंत तक भिन्न-भिन्न पार्ट बजाती हैं। कलयुग के अंत के समय सर्व आत्माओं के परमपिता निराकार ज्योति स्वरुप त्रिमूर्ति शिव परमात्मा सृष्टि पर पुनः दैवी स्वराज्य की स्थापना करने के लिए अवतरित होते हैं।  वे सर्व आत्माओं को उनकी यथार्थ पहचान देते हैं तथा अपने निज धाम परमधाम लौटने का निमंत्रण भी देते हैं। तब सर्व आत्माएं अपने दैहिक पार्ट को त्याग कर और निज स्वरुप में स्थित होकर अपने पालौकिक पिता के साथ अपने घर लौटती हैं।  अब पुनः घर लौटने का समय है। कुछ देर क्र विश्राम बाद पुनः पार्ट बजाने के लिए सतयुगी श्रेष्ठाचारी दुनिया में आना होगा। अतः अब  देह और देह के सर्व सम्बंधों को भुलाकर, आत्मिक स्वरुप में स्वरुप में स्थित होकर एक परमात्मा पिता को याद करना है ताकि आसुरी वृत्तियों से मुक्त होकर हम अपने निज धाम, परमधाम जाने के योग्य बन जाएं।

अहंकार मनुष्य को अलंकारहीन बना  देता है। 

अहम् और वहम् को छोड़ कर रहमदिल बनो। 

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